अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग

47 श्लोक - अर्जुन का विषाद, युद्ध के प्रति अनिच्छा, और श्रीकृष्ण से प्रश्न

अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग

गीता का प्रथम अध्याय जिसमें युद्धभूमि में अर्जुन के मन में उत्पन्न संदेह और दुविधा का वर्णन है। धृतराष्ट्र और संजय का संवाद, दोनों सेनाओं का वर्णन, और अर्जुन का विषाद।

47 श्लोक
पढ़ने का समय: 20-25 मिनट
विषय: विषाद, संदेह, कर्तव्य
अध्याय 1: अर्जुनविषादयोग
अध्याय 2

47 श्लोक: पूर्ण विवरण

धृतराष्ट्र-संजय संवाद (श्लोक 1-2)

धृतराष्ट्र उवाच
धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय ॥१-१॥
dhṛtarāṣṭra uvāca
dharma-kṣetre kuru-kṣetre samavetā yuyutsavaḥ
māmakāḥ pāṇḍavāścaiva kimakurvata sañjaya ||1-1||
शब्दार्थ
धृतराष्ट्र उवाच = धृतराष्ट्र ने कहा; धर्मक्षेत्रे = धर्म की भूमि में; कुरुक्षेत्रे = कुरुक्षेत्र में; समवेताः = एकत्रित हुए; युयुत्सवः = युद्ध की इच्छा वाले; मामकाः = मेरे पुत्र (कौरव); पाण्डवाः = पाण्डव; च = और; एव = ही; किम् = क्या; अकुर्वत = कर रहे हैं; सञ्जय = हे संजय।
भावार्थ
राजा धृतराष्ट्र ने अपने सारथी संजय से पूछा: हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित हुए, युद्ध की इच्छा से उत्सुक मेरे पुत्र (कौरव) और पाण्डवों ने क्या किया?
सञ्जय उवाच
दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा ।
आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ॥१-२॥
sañjaya uvāca
dṛṣṭvā tu pāṇḍavānīkaṁ vyūḍhaṁ duryodhanastadā
ācāryamupasaṅgamya rājā vacanamabravīt ||1-2||
शब्दार्थ
सञ्जय उवाच = संजय ने कहा; दृष्ट्वा = देखकर; तु = तो; पाण्डवानीकम् = पाण्डवों की सेना को; व्यूढम् = व्यूह रचना में खड़ी हुई; दुर्योधनः = दुर्योधन; तदा = तब; आचार्यम् = गुरु (द्रोणाचार्य) के पास; उपसङ्गम्य = जाकर; राजा = राजा (दुर्योधन); वचनम् = वचन; अब्रवीत = बोला।
भावार्थ
संजय बोले: हे राजन्! तब पाण्डवों की सेना को व्यूह रचना में देखकर राजा दुर्योधन गुरु द्रोणाचार्य के पास गया और बोला।

दुर्योधन का सेना वर्णन (श्लोक 3-11)

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम् ।
व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ॥१-३॥
paśyaitāṁ pāṇḍuputrāṇām ācārya mahatīṁ camūm
vyūḍhāṁ drupadaputreṇa tava śiṣyeṇa dhīmatā ||1-3||
शब्दार्थ
पश्य = देखो; एताम् = इस; पाण्डुपुत्राणाम् = पाण्डुपुत्रों की; आचार्य = हे आचार्य; महतीम् = विशाल; चमूम् = सेना को; व्यूढाम् = व्यूह में सजी हुई; द्रुपदपुत्रेण = द्रुपदपुत्र (धृष्टद्युम्न) के द्वारा; तव = आपके; शिष्येण = शिष्य द्वारा; धीमता = बुद्धिमान द्वारा।
भावार्थ
हे आचार्य! आपके बुद्धिमान शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टद्युम्न द्वारा व्यूह रचना में सजी हुई पाण्डुपुत्रों की इस विशाल सेना को देखिए।
अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि ।
युयुधानो विराटश्च द्रुपदश्च महारथः ॥१-४॥
atra śūrā maheṣvāsā bhīmārjunasamā yudhi
yuyudhāno virāṭaśca drupadaśca mahārathaḥ ||1-4||
शब्दार्थ
अत्र = इसमें; शूराः = वीर; महेष्वासाः = महान धनुर्धर; भीमार्जुनसमाः = भीम और अर्जुन के समान; युधि = युद्ध में; युयुधानः = सात्यकि; विराटः = राजा विराट; च = और; द्रुपदः = राजा द्रुपद; च = और; महारथः = महारथी।
भावार्थ
इसमें युद्ध में भीम और अर्जुन के समान वीर, महान धनुर्धर सात्यकि, विराट और महारथी द्रुपद हैं।
श्लोक 5
धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान्...
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श्लोक 6
युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्...
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श्लोक 7
अस्माकं तु विशिष्टा ये तान्निबोध द्विजोत्तम...
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श्लोक 8
भवान्भीष्मश्च कर्णश्च कृपश्च समितिञ्जयः...
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श्लोक 9
अपरे च बहवः शूरा मदर्थे त्यक्तजीविताः...
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श्लोक 10
अपर्याप्तं तदस्माकं बलं भीष्माभिरक्षितम्...
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श्लोक 11
अयनेषु च सर्वेषु यथाभागमवस्थिताः...
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सेनाओं का निरीक्षण (श्लोक 12-19)

श्लोक 12
तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः...
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श्लोक 13
ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः...
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श्लोक 14
ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ...
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श्लोक 15
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः...
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श्लोक 16
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः...
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श्लोक 17
काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः...
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श्लोक 18
सुघोषमणिपुष्पौ च सौभद्रः प्रवीरघाती...
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श्लोक 19
स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्...
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अर्जुन का विषाद (श्लोक 20-47)

श्लोक 20
अथ व्यवस्थितान्दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वजः...
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श्लोक 21
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते...
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श्लोक 22
सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत...
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श्लोक 23
यावदेतान्निरीक्षेऽहं योद्धुकामानवस्थितान्...
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श्लोक 24
एवमुक्तो हृषीकेशो गुडाकेशेन भारत...
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श्लोक 25
सञ्जय उवाच एवमुक्तस्तु कृष्णेन पार्थः...
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श्लोक 26
तत्रापश्यत्स्थितान्पार्थः पितॄनथ पितामहान्...
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श्लोक 27
तान्समीक्ष्य स कौन्तेयः सर्वान्बन्धूनवस्थितान्...
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श्लोक 28
अर्जुन उवाच दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्...
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श्लोक 29
व्यक्तं मे रोमहर्षः संजायते मुखं च परिशुष्यति...
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श्लोक 30
न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः...
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श्लोक 31
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव...
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श्लोक 32
न काङ्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च...
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श्लोक 33
किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा...
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अर्जुन उवाच
कथं भीष्ममहं सङ्ख्ये द्रोणं च मधुसूदन ।
इषुभिः प्रतियोत्स्यामि पूजार्हावरिसूदन ॥१-३४॥
भावार्थ
अर्जुन ने कहा: हे मधुसूदन! मैं युद्ध में कैसे भीष्म और द्रोण पर बाणों से प्रहार करूँगा? हे अरिसूदन! वे पूजनीय हैं।
गुरूनहत्वा हि महानुभावान्
श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके ।
हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव
भुञ्जीय भोगान्रुधिरप्रदिग्धान् ॥१-३५॥
भावार्थ
महान गुरुओं को मारने से तो मैं इस लोक में भिक्षा माँगकर भोजन करना ही अच्छा समझता हूँ। गुरुओं को मारकर इस लोक में रुधिर से सने हुए भोगों को भोगूँ, यह उचित नहीं।
श्लोक 36
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन...
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श्लोक 37
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्स्वबान्धवान्...
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श्लोक 38
यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः...
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श्लोक 39
कुलक्षये प्रणश्यन्ति कुलधर्माः सनातनाः...
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श्लोक 40
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः...
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श्लोक 41
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च...
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श्लोक 42
अधर्मानिमित्तानि दुःखान्ययुतशः प्रजाः...
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श्लोक 43
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन...
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श्लोक 44
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम्...
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श्लोक 45
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः...
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श्लोक 46
सञ्जय उवाच एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत्...
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सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥१-४७॥
sañjaya uvāca
evamuktvārjunaḥ saṅkhye rathopastha upāviśat
visṛjya saśaraṁ cāpaṁ śokasaṁvignamānasaḥ ||1-47||
शब्दार्थ
सञ्जय उवाच = संजय ने कहा; एवम् = इस प्रकार; उक्त्वा = कहकर; अर्जुनः = अर्जुन; सङ्ख्ये = युद्धभूमि में; रथोपस्थे = रथ के आसन पर; उपाविशत् = बैठ गया; विसृज्य = छोड़कर; सशरम् = बाणों सहित; चापम् = धनुष को; शोकसंविग्नमानसः = शोक से व्याकुल चित्त वाला।
भावार्थ
संजय बोले: इस प्रकार कहकर अर्जुन युद्धभूमि में रथ के आसन पर बैठ गया और शोक से व्याकुल चित्त होकर बाणों सहित धनुष को छोड़ दिया।

अध्याय 1: सारांश

गीता का प्रथम अध्याय "अर्जुनविषादयोग" गीता के उपदेश का पूर्वभूमि तैयार करता है। यह अध्याय मानव मन में उत्पन्न होने वाले संदेह, दुविधा और नैतिक विषाद का सूक्ष्म चित्रण प्रस्तुत करता है।

अध्याय के प्रारंभ में धृतराष्ट्र और संजय का संवाद होता है। फिर दुर्योधन अपनी और शत्रु की सेना का वर्णन करता है। सेनाओं के बीच शंखध्वनि होती है और युद्ध की तैयारी पूर्ण होती है।

तब अर्जुन श्रीकृष्ण से दोनों सेनाओं के बीच अपना रथ रखने के लिए कहता है। सेना में अपने गुरुजनों, रिश्तेदारों और मित्रों को देखकर अर्जुन का मन विषाद से भर जाता है। वह सोचता है कि इन्हें मारकर प्राप्त राज्य और सुख का क्या लाभ? वह युद्ध से विमुख हो जाता है और रथ के आसन पर बैठकर धनुष छोड़ देता है।

यह अध्याय मानवीय संवेदनशीलता, कर्तव्य और संबंधों के बीच दुविधा, तथा नैतिक उलझन का शाश्वत चित्रण है। अर्जुन का यह विषाद ही गीता के उपदेश का आधार बनता है।

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